Biography

“मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या की जीवनी” (Biography of Mokshagundam Viswesvarayya in Hindi)

भारतरत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या (एम. विश्वेश्वरैया) एक प्रख्यात इंजीनियर और राजनेता थे। उन्होंने कर्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है।भारत के निर्माण में उनके योगदान के लिए उनका जन्मदिन अभियन्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने ने ‘इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस’ के गठन का सुझाव दिया। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1955 में, उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया था।

व्यक्तिगत जीवन:-

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या का जन्म 15 सितम्बर 1861 को मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर में हुआ था। वह एक तेलुगु परिवार से थे। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री, वह संस्कृत के विद्वान थे। तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। जब विश्वेश्वरैया मात्र 12 साल के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। उन्होंने अपनी शुरूआती पढाई जन्मस्थान से ही पूरी की। उन्होंने बैंगलोर के सेंट्रल कॉलेज से स्नातक किया। उसके बाद, उन्होंने मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। सन 1883 की एलसीई व एफसीई परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके उन्होंने अपनी योग्यता का परिचय दिया और इसको देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

करियर:-

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्हें मुंबई के PWD विभाग में नौकरी मिल गयी। उन्होंने डेक्कन में एक जटिल सिंचाई व्यवस्था को कार्यान्वित किया। संसाधनों और उच्च तकनीक के अभाव में भी उन्होंने कई परियोजनाओं को सफल बनाने में अपना योगदान दिया। इनमें प्रमुख थे कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय और बैंक ऑफ मैसूर। ये उपलब्धियां उनके  कठिन प्रयास से ही संभव हो पाई। उन्होंने  सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए उन्होंने एक नए ब्लॉक सिस्टम का निर्माण किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जिसके माध्यम से बांध के  पानी के बहाव को रोका जा सकता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने भी की। उसके बाद, उन्हें उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है।

फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण की समस्याओं को देखते हुए उन्होंने कॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। उन्होंने मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के  मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया। वह लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि से भी परेशान थे। वह लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण अशिक्षा को मानते थे। इसलिए उन्होंने कई स्कूलों का निर्माण करवाया, उनके कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या 4,500 से बढ़ाकर 10,500 तक हो गयी थी। उनके कठिन प्रयासों के बाद मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।

उन्होंने देश में मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। 1918 में, विश्वेश्वरैया दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। 1947 में, वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ। 1935 में, उन्होंने ‘प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया’ भी लिखी। 1955 में, उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने उनके सम्मान में  डाक टिकट जारी किये। 14 अप्रैल 1962 को, 101 वर्ष की दीर्घायु में उनका स्वर्गवास हो गया।

पुरुस्कार और सम्मान:-

भारत के निर्माण और विकास में अपने योगदान के लिए उन्हें कई उपाधियो से नवाजा गया जिनमे “केसर-ए-हिंद ‘ की उपाधि, कम्पैनियन ऑफ़ द इंडियन एम्पायर , डॉक्टर ऑफ़ साइंस से सम्मानित, लन्दन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सिविल इंजीनियर्स की मानद सदस्यता, D. Litt से सम्मानित, भारत रत्न’ से सम्मानित और ‘दुर्गा प्रसाद खेतान मेमोरियल गोल्ड मेडल’ शामिल है।

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