Dashrath Manjhi Story in Hindi

दशरथ मांझी की कहानी Dashrath Manjhi Story in Hindi

Dashrath Manjhi Story in Hindi
Dashrath Manjhi Story in Hindi

हमारी तादात तक़रीबन 125 करोड़ है. इसमे से बहुत ग्रामीण भारतीय है जबकी कई शहरी बस्तियों में रहते है. प्रत्येक दिन, हमारे लाखो देशवासी मुश्किलो के खिलाफ संघर्ष कर एक गरिमामय जीवन पाने की कोशिश कर रहे है।  जबकि अन्य, अभी भी इस जवाब  की खोज में है, बाधाओ के उपाय सोचने में जिनसे नागरिको का जीवन बेहतर हो सके.

यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने ना केवल सोचा बल्कि करके दिखाया। वो गरीब भारतीयों  में भी सबसे गरीब था. उसने निश्चय किया कि जो सत्ता होकर भी उसके लोगो की मदद नहीं सकता तो वो ही सब करेगा.  यही वो आदमी था जो सब अपने आप ही करना  चाहता था. तभी, इक पल भी सोचे बिना, वो आगे बढ़ा और अपने हाथो से सब किया. यह कहानी दशरथ मांझी की हैं जिसने  एक पर्वत को हिला दिया, जिससे की उसके लोग सही समय पर डॉक्टर के पास पहूच सके.

– गेहलौर का पुरवा

1960 में, पूर्वी भारत बिहार में, गया के अत्रि पथरीले  क्षेत्र में, जमीन रहित मजदूर और मुसहर्स रहा करते थे. गेहलौर के गर्भ में वो समाज की सबसे नीची जाति के रूप में थे, और मूलभूत जरूरत जैसे-पानी, बिजली ,पढाई और चिकित्सा  से दूर थे. एक 300 फ़ीट ऊँचा पर्वत उनके और अन्य नागरिको के बीच में था.

अन्य मजदूरो की तरह, मांझी भी पर्वत की दूसरी तरफ  काम करता था. दोपहर में उसकी पत्नी फागुनी उसके लिए खाना लाती  थी. जैसा की वहा पर रोड नहीं थी तो पर्वत  पार करने में घंटो लग जाते थे. मांझी दूसरी तरफ खेत के मालिक के यहाँ कृषि करता था. वो पत्थर तोड़ता और कुछ ही समय में थका और भूका महसूस करता.

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मांझी फागुनी (पत्नी) का इंतज़ार करता था. उस दिन वो खाली हाथ और जख्मी हालात में थी. कठोर सूर्य की मार की वजह से वह चट्टान से फिसल गयी. उसका पानी का बर्तन गिर गया. वो कई फ़ीट नीचे फिसली और उसके में पैर चोट लग गयी.  दोपहर के काफी समय बाद वो  लंगड़ाती हुए अपने पति के पास पहूँची। मांझी उसे दंड देने के लिए उसकी तरफ दौड़ा, लेकिन  आँसू देख कर वह रुक गया.

– मांझी की यात्रा

मांझी ने अपनी बकरी बेच कर एक हथौड़ा, छेनी और हत्था ख़रीदा. वो पर्वत के सबसे ऊपर चढ़ा और उसे तोड़ने लगा. सालो बाद उसके फिर सोचा, “ इस पर्वत ने कई जाने ली है.  में यह कभी नहीं सहूंगा की वो मेरी पत्नी को चोट पहूचाये। अगर  ज़िन्दगी भी लग जाये तो भी इस पर्वत को तोड़ कर  इसमें से सड़क निकालूंगा “।

पर्वत को तोड़ते- तोड़ते उसने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी।  उसका परिवार अधिकतर भूखा  ही रह जाता था। इसके बाद फागुनी बीमार हो गयी।  डॉक्टर वजीरगंज में था, जोकि पर्वत से 75 किलोमीटर दूर थे। वहा न जा सकने के कारन, वह मर गयी।  उसकी मृत्यु ने उसे और प्रेरित किया।

पर यह आसान नहीं था।  पर्वत को तोड़ते समय चट्टान के टुकड़े उसकी तरफ थे।  वो जख्मी होता, आराम करता और फिर लग जाता। उसी समय वो लोगो को  उनका सामान उस पार पहूचाने का काम पैसे लेकर करता ताकि वो अपने बच्चो को पाल  सके। दस वर्षो के बाद भी मांझी तोड़ता रहा, फिर लोग भी मदद  के लिए आगे  आये।  1982  में गेहलौर में एक चमत्कार हुआ।

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मांझी पत्थर की एक  दिवार को तोड़कर एक खुले रस्ते में से निकला। 22 साल  दशरथ दास मांझी, एक बिना ज़मीन के मजदूर ने पर्वत पर विजय प्राप्त कर ली। उसने एक 360  फ़ीट लंबी और 30  फ़ीट चोड़ी सड़क बनायीं।  वजीरगंज के डॉक्टर, नौकरियां और स्कूल अब सिर्फ 5  किलोमीटर दूर थे। अत्रि के 60 गावो के लॊग उसकी सड़क का उपयोग कर सकते है। बच्चो को स्कूल जाने के लिए सिर्फ 3 किलोमीटर चलना पड़ता है। सभी उसके आभारी है और उसे श्रद्धा से “बाबा“ बुलाने लगे है।

लेकिन मांझी यही नहीं रुका। उसने उस रोड को मुख्य सड़क  से जोड़ने का प्रयास शुरू कर दिया। वह रेलवे लाइन के सहारे चलते हुए राजधानी दिल्ली पहूचा, रास्ते  में सारे स्टेशन मास्टर्स के हस्ताक्षर लेते हुए। उसने अपनी सड़क, अपने लोगो के लिए अस्पताल, स्कूल व पानी की याचिका दी। जुलाई 2006 में बाबा बिहार के मुख्यमंत्री नितीश  “जनता दरबार “ में पहूँचे। मंत्रीजी अभिभूत हुआ और अपनी कुर्सी मांझी को बैठने को दी, जोकि मांझी के तबके लोगो की दी जाने वाली इज़्ज़त में से सबसे बड़ी थी।

सरकार ने उसे ईनाम में एक मकान दिया।  मांझी ने फिर वो मकान एक हॉस्पिटल के लिए दान कर दिया।  उन्होंने उसका नाम पदम श्री के लिए भेजा लेकिन वन विभाग ने उसे कानून विरुद्ध कार्य मान कर मना कर दिया। वे बोले की उन्हें किसी अवार्ड, इज़्ज़त या चाह नहीं है, वो यह सिर्फ अपने लोगो के लिए एक सड़क, एक स्कूल और एक अस्पताल चहते है।  वे कड़ी मेहनत करते है. यह उनके  बच्चो और महिलाओ के लिए मददगार होगा। उस सड़क को बनाने में उन्हें तक़रीबन 30 साल लगे।

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अगस्त 17, 2007  में दशरथ मांझी कैंसर से अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई हार गया। उसने जो भी किया वो नीजी स्वार्थ के लिए नहीं था।  मांझी ने, कहा- “ मैंने इस कार्य को अपनी पत्नी की  शुरू किया, लेकिन  लोगो के लिए इसे जारी रखा। अगर में नहीं करता तो कोई नहीं करता। अब  वो चला गया है, पर उसके लोग अभी भी गरीब है।  वहाँ बिजली के कम्भे है पर बिजली नहीं है, कुएं है पर उनमे पानी नहीं है न पक्के हॉस्पिटल है और न पक्के मकान है।  मांझी के बेटे की पत्नी हाल ही में बीमारी से मर गयी। इतने सालो बाद उनका भविष्य गरीबी  के पर्वतो से घिरा हैं जो की  डॉक्टर भी नहीं बुला सकते।

मांझी का बड्डपन और प्रेरणा स्त्रोत जीवन हमेशा अनेको भारतीयों के मन हमेशा जीवित रहेगा। जो खुद अपनी परेशानियों  लड़ते हुए  बाहर आते हैं। वो उन सब लोगो में है जिनमे परेशानियों का खुदका एक पर्वत हैं।