कहानियां

Hindi Moral Stories for Class 8 – कक्षा 8 के लिए रोचक कहानियाँ

हम आपके लिए लायें हैं बेस्ट best hindi moral stories for class 8. आपको अपने होमवर्क के लिए यहाँ पर  अच्छी अच्छी कहनियाँ मिल जाएँगी. मैं आशा करता हूँ की आपको  best hindi moral stories for class 8 जरुर जरुर पसंद आयेंगी.

 Hindi Moral Stories for Class 8

कक्षा 8 के लिए रोचक कहानियाँ

Hindi Moral Stories for Class 8

मजदूर ही भला

एक मजदूर पत्थरों को तोड़कर छोटे छोटे टुकड़े किया करता था. वह बेहद परिश्रमी और ईमानदार था. सारा दिन काम करके जो मजदूरी मिलती उससे गुजारा करता और खुश रहता. वह भगवान शिव का भक्त था. काम के बाद जो समय मिलता उसे पूजा-अर्चना में लगा देता.

एक शाम वह काम से लौटा और भोजन करने के बाद भगवान का स्मरण कर सो गया. सपने में भगवान शिव ने उसे दर्शन देकर कहा – मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जो चाहे मांग लो.

मजदूर बड़ा सीधा था उसने कहा प्रभु मुझे एक छायादार वृक्ष बना दो.

भगवान ने उसे छायादार वृक्ष बना दिया.

थोड़ी देर में सूरज की तेज गर्मी से उसकी पत्तियां सूखा कर झड़ गई. वह नंगा हो गया. उसे लगा कि सूरज अधिक शक्तिशाली है.

उसने शिव का स्मरण कर प्रार्थना कि – भगवान, मुझे सूरज बना दो. अगले ही पल वह सूरज बन गया.

सूरज बनकर तेजी से चमकने लगा.

तभी बादलों के टुकड़े ने उसे ढक लिया. सूरज को लगा बादल ज्यादा बलशाली है. उसने फिर प्रार्थना की – हे भगवान, मुझे बादल बना दो.

वह बादल बन गया. तभी हवा का एक झोंका आया और उसे गेंद की तरह इधर उधर उडाने लगा. बादल को लगा वह हवा से कमजोर है. उसने भगवान से हवा बनाने की प्रार्थना की. भगवान ने उसे हवा बना दिया.

हवा बन कर रहे वह आसमान में उड़ने लगा. अचानक उसके मार्ग में एक विशालकाय पर्वत आ गया और उसके वेग में रुकावट आ गयी. उसने सोचा कि पर्वत हवा से अधिक शक्तिशाली है. उसने भगवान से पर्वत बनाने की प्रार्थना की. भगवान ने उसे पर्वत बना दिया. तभी उसे अपने पैरों में चुभन महसूस हुई. उसने देखा कि एक मजदूर उसे छेनी-हथोड़े से तोड़ रहा हैं. यह देखकर उसे अपने आप पर शर्म आई और उसने सोचा की पर्वत से भी शक्तिशाली तो मजदूर है.

तभी उसकी आंखें खुल गई और यह जानकर बड़ी खुशी हुई कि वह मजदूर ही है. उसने भगवान का धन्यवाद दिया और कहां – हे भगवान, मैं मजदूर ही भला!!

किसी ने सच ही कहा है जिसे जो काम ईश्वर ने दिया है उसे पूरी निष्ठा और लगन से ही वही काम करना चाहिए. जो व्यक्ति अपना काम ना करके दूसरों की बराबरी करता है वह अपने काम से भी हाथ धो बैठता है. दूसरों की होड़ करने वाले सदा दुखी रहते हैं.


सुन्दरता बड़ी या उपयोगिता

एक बार एक मोर था. वह बहुत ही घमंडी था. उसे अपनी सुंदरता पर बड़ा घमंड था. वह हर समय अपनी सुंदरता का बखान करता रहता था. रोज नदी के किनारे जाकर पानी में अपनी परछाई देख कर बहुत खुश होता. वह कहता -” जरा मेरी पूछो देखो”. मेरे पंख तो देखो, कितने मनमोहक है. मैं दुनिया के सभी पक्षियों से सुंदर हूं.

एक दिन मोर को नदी के किनारे एक सारस दिखाई दिया. उसने सारस को देखकर उपेक्षा से मुंह फेर लिया और सारस का अपमान करते हुए बोला – कितने रंगहीन पक्षी हो तुम! तुम्हारे पास तो एक दम सादे और फीके हैं. शरीर का रंग भी आकर्षक नहीं है. बिल्कुल धुले कपड़े जैसे लगते हो.

सारस ने कहा – मेरे दोस्त, तुम्हारे पंख सच में बहुत सुंदर पर हैं. पर सुंदरता ही सब कुछ नहीं होती. बात तो उपयोगिता की है. तुम अपने पंखों से ऊंची उड़ान नहीं भर सकते जबकि मैं अपने पंखों से आसमान में ऊंचाई तक उड़ सकता हूं. यह कहकर सारस उड़ता हुआ आकाश में बहुत ऊंचा चला गया. मोर धरती पर खड़ा टुकुर टुकुर उसे देखता रह गया. मोर समझ गया कि किस चीज का सुंदर होना अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है उसका उपयोगी होना.


बिना विचारे जो करे…

एक कस्बे में रामसिंह और सीता नाम के पत्नी पत्नी रहते थे. उनके एक पुत्र था. पुत्र की आयु अभी केवल 2 वर्ष थी और उसका नाम शंभू था.

पुत्र जन्म के पहले से ही उन्होंने अपने घर में एक नेवला पाल रखा था. शंभू और नेवला एक दूसरे से बहुत हिलमिल गए थे. दोनों पक्के दोस्त थे.

एक दिन रामसिंह अपने खेत पर गया हुआ था. सीता भी किसी काम से बाहर आई हुई थी.

शंभू पालने में गहरी नींद सो रहा था.

नेवला पालने के पास बैठकर उसके रखवाली कर रहा था.

एकाएक नेवले की नजर एक सांप पर पड़ी, जो धीरे-धीरे रेंगता हुआ शंभू के पालने की और बढ़ रहा था.

कुछ क्षण में सांप शंभू के पालने के पास पहुंचकर उसके सामने खड़ा हो गया. इससे पहले की सांप नेवले ने उछलकर सांप के गर्दन दबोच ली.

फिर तो सांप और नेवले की जमकर लड़ाई हुई. अंत में नेवले ने सांप को मार डाला.

फिर वह घर के बाहर जाकर बैठ गया था कि जैसे ही मालकिन आए तो उनको बताएं कि क्या अनर्थ होने वाला था.

थोड़ी देर बाद नेवले ने सीता को घर की औरते देखा. सीता नेवले के खून से सने मुंह और पंजे देखकर चकित रह गई. उसे शंका हुई कि नेवले ने उसके बेटे को मार डाला है.

वह गुस्से से पागल हो गई.

उसने बरामदे में पड़ा हुआ डंडा उठाया और जोर जोर से नेवले को मारने लगी. उसने उसे इतना मारा कि बेचारे की मृत्यु हो गई.

इसके बाद वह दौड़ते हुए कमरे में गई. वहां उसने देखा की उसका बीटा सुरक्षित सो रहा था और पास में एक काला साहब मरा हुआ पड़ा था.

उसे सारा माजरा समझते देर न लगी. वह दौड़ते हुए बाहर आई और नेवले की लाश को सीने से लगाकर बिलख बिलख कर रोने लगी. उसे अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ. उसने अपने बच्चे के हितेषी को ही मार डाला.

मगर अब पश्चाताप करने से क्या लाभ?


चोर कौन 

एक शहर में एक व्यापारी रहता था. उसका व्यापार काफी दूर दूर तक फैला हुआ था. उसके काफिले तिब्बत, आसाम, बंगाल और कश्मीर तक जाते थे. व्यापारी धन्य-धान्य से परिपूर्ण था. लक्ष्मी कि उस पर असीम कृपा थी.

उसे दुख था तो बस एक ही उसके कोई संतान नहीं थी. उसका सारा कामकाज सेवकों के बलबूते पर चलता था. वह अपने सेवकों के काम से प्रसन्न होकर उन्हें पुरस्कार भी दिया करता था. सेवक भी उसके मालिक से प्रसन्न रहते थे. व्यापारी की गोदाम में अथाह मल पड़ा रहता था. उसकी देखभाल के लिए चार पहरेदार नियुक्त थे. पहला पहरेदार ईमानदार था तथा लग्न से माल की रखवाली करता था. दूसरा पहरेदार लापरवाह था. वह रात भर वही सोया रहता था. तीसरे पहरेदार की आदतें खराब थी. वह रात होते ही नशे-पानी के जुगाड़ में लग जाता था. चोथा पहरेदार तो सबसे गया बीता था. वह चोर था. जैसे ही रात होती, वह इधर उधर चोरी करने निकल जाता.

गोदाम का माल अगर सुरक्षित था तो केवल ईमानदार पहरेदार की वजह से, लेकिन व्यापारी यही समझता था कि चारों पहरेदार लगन से चौकीदारी करते हैं और उसके गोदाम की हिफाजत करते हैं. इसलिए एक दिन खुश होकर उसने चारों पहरेदारों को इनाम देने का निश्चय किया.

उसने चारों को बुलाया. चारों पहुंच गए. व्यापारी मकान के छज्जे पर खड़ा था. उसने ऊपर से ही मोहरों की चार थैलियां फेंकते हुए कहा – चारों एक-एक बाँट लेना.

जब ठेलिया नीचे आई तो चारों पहरेदार उन्हें लेने के लिए लपके. तीनों पहरेदारों को तो तेलिया मिल गई पर जो ईमानदार चौकीदार था उसे थैली ना मिली. पता नहीं चौथी थेली कहां गायब हो गई थी? ईमानदार चौकीदार ने व्यापारी से शिकायत की. व्यापारी समझ गया कि किसी पहरेदार ने दो थेलीया हथिया ली है. व्यापारी को यह देखकर बहुत बुरा लगा कि उसका कोई सेवक बेईमान भी है. उसे किसी भी हालत में बेईमान सेवक स्वीकार नहीं था.

वह उसी समय राजमहल पहुंचा और राजा को सारी बात कह सुनाई. राजा ने कोतवाल को बुलाया और कहा कल तक चोर का पता लगाओ नहीं तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.

कोतवाल परेशान हो गया उसने चारों पहरेदारों को कोतवाली में बुलाया और पूछताछ की. साम दाम दंड भेद की सारी नीतियाँ अपना ली लेकिन चोर का पता ना चला. गुस्से में आकर उसने चारों पहरेदारों को हवालात में बंद कर दिया और घर आकर बिना खाए पिए चारपाई पर लेट गया. यह तो साफ था कि उन चारों में से ही कोई एक चोर है. मगर वह सच्चाई स्वीकार करके अपना गुनाह कबूल करने को राजी नहीं था. यह सब देखकर कोतवाल को नौकरी हाथ से जाती नजर आ रही थी. यही उसकी चिंता का कारण था.

कोतवाल की बेटी अपने पिता को चिंतित देखकर परेशान हो उठी. वह अपनी बड़ी सयानी और समझदार थी. उसने अपने पिता से उनकी परेशानी का कारण पूछा तो कोतवाल सब कुछ बताते हुए बोला अगर कल तक चोर का पता ना लगा तो मुझे राजा नौकरी से हटा देंगे.

लड़की ने थोड़ी देर सोच कर कहा – आप चिंता मत कीजिए, चोर का पता मैं लगाऊंगी.

लड़की ने हल्का सा श्रृंगार किया और कैदी का भोजन लेकर वह उस कोठरी में जहां पहुंची, जिसमें उन चारो पहरेदारों को रखा गया था. पहरेदार एक युवती को अपने सामने देख कर चकित रह गए. कोतवाल की बेटी उनके मनोभावों को भाप कर मुस्कुराते हुए बोली – मैं यहां कैदियों को खाना खिलाती हूं. जो कैदी मेरी कहानियां सुनता है उसे मैं भरपेट स्वादिष्ट भोजन खिलाती हूं.

कहानी सुनने में भला उनका क्या जाता था. स्वादिष्ट भोजन के लालच में चारो ने कहानी सुनना मंजूर कर लिया. तब लड़की कहानी आरम्भ करती हुई बोली एक लड़की थी. बचपन में ही उसकी शादी तय हो गई थी. वह अपने मां बाप के साथ रहती थी. जब वह बड़ी हो गई तो मां बाप ने उसे पति के घर भेजने का निश्चय किया. मगर ससुराल से उसे लेने कोई नहीं आया. अतः वह साज श्रृंगार कर अकेले ही ससुराल की और चल देती है. रास्ता दुर्गम था पर वह बिना घबराए आगे बढ़ती गई. अचानक रास्ते में उसे एक चोर मिला. उसने लड़की के सारे गहने उतार कर देने को कहा. लड़की ने विनती की कि वह पहली बार पति के घर जा रही है. अगर बदन पर गहने न हुए तो ससुरालवाले बुरा मानेंगे, तो पति के घर पहुंच कर वह उसे गहने सोप देगी. चोर मान गया और उसके पीछे पीछे चलने लगा. आगे चलकर एक शराबी ने लड़की का रास्ता रोक लिया. लड़की ने उससे कहा – मैं ससुराल जा रही हूं, तुमसे बाद में मिलूंगी. शराबी लड़की पर मुग्ध हो गया था. वह भी उसके पीछे चल पड़ा. थोड़ी दूर चलने पर लड़की को एक दानव ने रोक लिया. वह भूखा था, बोला, ऐ लड़की मैं तुझे खाऊंगा. लड़की ने बिना घबराए उत्तर दिया -पहले मुझे पति के दर्शन कर लेने दो फिर खा लेना. दानव ने उसकी बात मान ली. वह भी लड़की के साथ हो लिया. लड़की ससुराल पहुंची उसने अपने सास ससुर और पति के पैर छुए आशीर्वाद लिया. दरवाजे के बाहर चोर, शराबी, दानव खड़े थे. ऐसा मनोहर पारिवारिक दृश्य देखकर उनका मन पिघल गया. उन्होंने लड़की को आगे तंग करने का विचार त्याग दिया और वापस वहां से लौट गए.

कहानी सुनाकर लड़की ने चारों पहरेदारो से पूछा, “अब तुम बताओगे कि चोर, शराबी और दानव में से किसका स्वभाव अधिक अच्छा था?

पहला पहरेदार इमानदार था, उसने कहा भला इनमें से किसका स्वभाव अच्छा हो सकता है!!! वह तीनों ही दुष्ट प्रवृत्ति वाले थे.

दूसरे पहरेदार ने दानव को अधिक अच्छा बताया. वह अपने उत्तर को तर्क की कसौटी में खरा उतारने की कोशिश करता हुआ बोला, ” देखो ना, भूखे होते हुए भी उसने लड़की को नहीं खाया.

तीसरा पहरेदार बोला, ” सबसे अच्छा शराबी था, देखो ना कि किस तरह उसने लड़की को जाने दिया.

चौथा बोला, ” तुम लोग तो बेवकूफ हो. सबसे अच्छा तो चोर था. सामने इतने सारे गहने होते हुए भी उस लड़की को हाथ नहीं लगाया”

कोतवाल की लड़की चारों के उत्तर सुनकर समझ गई की चोर कौन है. जो पहरेदार जिस प्रवृत्ति का था, उसने उसे प्रवृत्ति वाले की प्रशंसा की थी. वह अपने मकसद में कामयाब हो गई थी अतः वह घर लौट गई. उसने अपने पिता को बता दिया कि असली चोर कौन है. दूसरे दिन सुबह होते ही कोतवाल हवालात में पहुंचा और चोर को राजा के दरबार में पेश कर दिया.

राजा ने चोर को गौर से देखा और पूछा- ” मोहरों की थैली कहां पर है?”

किंतु चोर ने चोरी से इनकार करते हुए बोला- ” मैं बेकसूर हूं महाराज, मुझे इस खेल के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है”

काफी पूछने पर भी जब चोर ने मोहरों की थैली का पता नहीं बताया तू राजा को क्रोध आ गया. इसमें चोर को फांसी की सजा सुना दी. अब चोर मौत के भय से सच्चाई बताने के लिए विवश हो गया. उसने तुरंत राजा को मोहरों की थैली का पता बता दिया. इस प्रकार असली चोर पकड़ा गया और व्यापार की आंखें खुल गई. उसने ईमानदार पहरेदार को इनाम ही नहीं दिया बल्कि उससे सब पहरेदारों का मुखिया भी बना दिया. उसके बाद उसने अपने सेवकों पर अंधविश्वास करना छोड़ दिया.