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पापा की यादें – एक बेटी की ज़ुबानी

papa ki yadein a hindi story

खिड़की से आती तेज हवा से सामने रखा कलेंडर उड़ रहा था. जून का पन्ना पलट कर जुलाई और उसके पीछे छुपे अगस्त को बेनकाब कर रहा था. 5 अगस्त को मां का 60वां जन्मदिन था. मेरी आंखें भीग गई. घर के हर सदस्य का और खुद अपना जन्मदिन भी पूरे जोर-शोर से मनाने वाली माँ ने पिछले साल से हर खुशी से किनारा कर लिया था. पापा के चले जाने के बाद मां जैसे बिल्कुल बदल गई थी. हम बेटियों को मुश्किल के वक्त में भी मुस्कुराते रहने की सीख देने वाली माँ खुशी के मौके पर भी उदासी ओढ़े रहती. पापा को तो गए साल भर हो गया था लेकिन मां के लिए जैसे वक्त वही ठहर गया था. मैं मां को समझाती थी की पापा अपनी उम्र जी कर गए हैं. सारी जिम्मेदारियां पूरी करके गए हैं. फिर एक दिन तो सबको जाना होता है. मेरी इन खोखली फिलॉसफी भरी बातों की मां अनसुना कर देती और खामोशी से अपने काम में लगी रहती. पापा की कमी का दुख उनका मन भोग रहा था जबकि उनकी दिनचर्या में कोई खास बदलाव नहीं आया था. वही सुबह उठकर आंगन बुहारना, तुलसी वाली चाय बनाकर मधुकामिनी के नीचे झूले पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ अखबार के पन्ने पलटना. बस अब झूले में उनके साथ पापा नहीं होते हैं और इसलिए उनकी गपशप से आंगन गुलजार नहीं होता न माँ की खिलखिलाहट से घर की नीरसता दूर होती. पापा मां के सिर्फ पति नहीं थे उनके सबसे करीबी दोस्त भी थे और उम्र के जिस दौर में साथी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है वही पापा ने हाथ छुड़ा लिया था. अचानक आये इस खालीपन से माँ को इतना तोड़ दिया था कि उन्होंने खुद को अपने गमों के साथ एक खोल में बंद कर आया हूं. मगर मैं मां को जिंदगी की ओर लोटाना चाहती थी. कैसे??? यह नहीं जानती थी. मां की खोई खोई देख कर मेरा मन भी उनकी उदासी ओढ़ने लगा था. तभी मीनू यानि मेरी छोटी बहन का दिल्ली से फोन आया. वह दूर रहकर भी हर बात समझ रही थी मां की लाडली जो थी. उसने एक तरकीब हो सुझाई. अनुदि क्यों न हम माँ को उनके जन्मदिन पर एक सरप्राइज दें??? कैसा सरप्राइज मीनू. माँ तो जन्मदिन मनाना ही नहीं चाहती. कहते हुए शब्द मेरे हलक में अटक रहे थे. मगर मीनू चहकते हुए बोली दीदी माँ को उनके जन्मदिन पर आगरा ले चलने की तैयारी करो. मैं भी प्लानिंग करती हूँ.

मां और पापा पापा परफेक्ट कपल थे. मां की शादी हुई तो 18 साल की थी. शादी के बाद पापा ने ही उनको आगे पढ़वाया और घुमने की शौकीन मां को उन्होंने पूरा हिंदुस्तान घुमा दिया था. बस एक ही जगह न जाने कैसे रह गई थी और वह थी आगरा. मुमताज शाहजहां की जोड़ी जैसे मां और पापा ने बस ताजमहल नहीं देखा था. मीनू के आईडिया ने मेरे भीतर भी एक जोश भर दिया. मुझे लगा जैसे की मेरे हाथ एक मास्टर की लग गई है जिससे मैं मां को उनके मन के अंधेरे तहखाना से बहार निकाल सकती हूं. उनको पहले की तरह मुस्कुराते जीते देख सकती हूँ. माँ के जन्मदिन के एक महीने पहले से ही मैंने उनको कहता शुरू कर दिया था की माँ अगले महीने मेरी दिल्ली में मीटिंग है तो आप भी साथ चलना. पहले की तरह कोई सवाल जवाब नहीं करती थी. एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह उन्होंने हामी भर दी और फिर क्या था. मैं और मीनू पूरे उत्साह के साथ तैयारियों में जुट गए. मोसी, मामा, और मम्मी की 2 खास सहेलियों को फोन करके इनविटेशन दिया. आगरा में ठहरने और ताज घूमने का इंतजाम किया. सब करते हुए बस मन यही दुआ कर रहा था कि माँ अपनी उदासी से बहार निकल आयें. आखिर जन्मदिन के 2 दिन पहले हम सब सफर पर निकल पड़े. माँ तो चुपचाप अपनी बर्थ पर लेटी हुए किताब पढ़ती रही या खिड़की से बहार देखती रही. यह समझ नहीं आ रहा था की उनके मन में चल क्या रहा है. अभी आगरा पहुचने में थोड़ी ही देर थी की माँ की सांसे तेजी से चलने लगी. उनको पानी पिलाया पर हालत ज़रा भी नहीं सुधरी. मां को अस्थमा के अटैक आया था. ट्रेन पूरी रफ़्तार से दोड रही थी और मेरी धड़कने की उसी तेजी से चल रही थी. आखों के सामने अँधेरा चने लगा मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था. तभी हमारे पास बैठे एक व्यक्ति ने UP 100 डायल कर दिया. कॉल किसी रीना शुक्ला ने उठाया. उन्होंने ट्रेन का नाम, नंबर, कोच का नंबर, वगैरह सारी जानकारी ली और मदद का पूरा यकीं दिलाया. उनसे बात करके मुझे थोड़ी सी तसल्ली हुई और रीना की बात बिलकुल सही थी. आगरा में जैसे ही ट्रेन पहुची वह एम्बुलेंस तैयार थी. मिनटों में माँ को लेकर अस्पताल रवाना हो गयी. UP 100 UP पुलिस की इमरजेंसी सेवा हैं जहा 24 घंटे फ़ोन पर शिकायत दर्ज होती हैं और 15 से 20 मिनट में पुलिस की सहायता पहुचने की पूरी गारंटी. वक़्त पर इलाज मिलने से मां की तबीयत एकदम संभल गई. अगले दिन हम उनको अस्पताल से होटल भी ले आए. वहां उन के स्वागत में उनकी लाडली बेटी मीनू, उनकी चहेती सहेलियां, भाई, बहन सारा परिवार मौजूद था और एक बड़ा सा केक भी. मां की आंखें भर आई. यह पहला खुशी का मौका था जब पापा साथ नहीं थे. पापा हम सभी के जन्मदिन पर ऐसे ही सरप्राइज पार्टी arrange करते थे. पसंदीदा जगह की आउटिंग, शाम को ढेर सरे पकवान और मोमबत्ती से सजा केक. पापा नहीं थे तो क्या?? माँ का ख्याल रखने के लिए उनकी बेटियां तो थी. मां ने केक काटा. सब ने उनको उनके पसंद के तोहफे दिए. फिर हम सब ताज महल गए.

माँ संगमरमर की उस ईमारत को देख कर दंग रह गई और धीरे से बोली काश तेरे पापा होतें. मैंने मुस्कुराते हुए कहा पापा है तो सही आपके दिल में. हम सब की यादों में. माँ भी मुस्कुरादी. और उन्हें दुखी होने का मोका ही कहा मिल रहा था और वो भी हमारे साथ गुनगुनाने लगी Happpy Bday to you.

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