Prithviraj Chauhan History In Hindi – पृथ्वीराज चौहान इतिहास

Prithviraj Chauhan History In Hindi
Prithviraj Chauhan History In Hindi

पृथ्वीराज चौहान एक राजपूत राजा थे जिन्होंने 12 वी सदी में उत्तरी भारत के अजमेर और दिल्ली राज किया। वो दिल्ली के ताज पर बैठने वाले आखरी स्वतंत्र हिन्दू राजा थे।  जो राज पिथोरा के नाम से भी जाने जाते थे। चौहान वंश में पृथ्वीराज चौहान की सबसे ज्यादा जय जयकार हुई थी।  उनके पिता का नाम सोमेश्वर चौहान था , जोकि  अजमेर के राजा थे।  पृथ्वीराज अपनी म्हणता के संकेत  अपनी छोटी उम्र में ही देने शुरू कर दिए थे।  वो बहुत बहादुर और चतुर थे, तथा सेना के  कार्यो में भी वो निपुण थे। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने आवाज़ सुनकर निशाना लगाना सीख लिया था।  उनके पिता की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज राजा बने।  उन्होंने अपने राज्य को बढ़ाने के लिए कई युद्ध किये और एक पराक्रमी राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए। मोहम्म्द  पलायन का कारन भी पृथ्वीराज ही थे।

प्रारंभिक जीवन – उनके पिता की मृत्यु एक  युद्ध में  1179 में हुई  थी , इसके बाद पृथ्वीराज अजमेर और दिल्ली के राजा बने। शुरुआत में उन्होंने राजस्थान राजस्थान के  राज्यो को जीतना प्रारंभ किया।  इसके बाद उन्होंने खजुराहों और महोबा पर विजय की। 1182  में उन्होंने गुजरात के चौलकय के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।  कई  साल तक  युद्ध चला पर पृथ्वीराज हार गए। उन्होंने कन्नौज पर भी कई सैनिक अभियान चलाये ताकि वो दिल्ली को अपने काबू में कर सके।   उनके इस कार्य से उन्हें सफलता मिली। उन्होंने पडोसी राज्यो में होने वाली राजनीती से भी खुद को  था।

शाहहबुद्दीन मोहम्मद गौरी ने 1191 में पूर्वी पंजाब के भटिंडा  आक्रमण किया जोकि पृथ्वीराज चौहान के  सबसे आगे था।  चौहान नें कनौज से मदद मांगी पर उन्होंने मना कर दिया।  तब  भटिंडा की तरफ बढ़ा और तराइन में अपने दुश्मन से लड़ा।  इस लड़ाई को तराइन के प्रथम युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।

पृथ्वीराज ने  जीती और मोहम्मद गौरी को बंधी बना लिया।  गौरी के शमा मांगने पर उस भलाई करने वाले राजा ने उसे छोड़ दिया।  उसके कई मंत्री इस निर्णय के विरुद्ध थे पर फिर भी पृथ्वीराज ने उसे सम्मानपूर्वक छोड़ दिया।  मोहम्मद गौरी  छोड़ने का निर्णय गलत साबित हुआ और उसने फिर से अपनी सेना को संयोजित करना शुरू कर दिया।  गौरी 1992 में 1,20,000 सैनिको की सेना लेकर आया और उसने फिर से चौहान पर आक्रमण किया जोकि तराइन की दूसरी लड़ाई के नाम से जाना जाता है। चौहान की सेना में 3000  हाथी थे, 3,00,000 घुड़सवार, और पैदल सैनिक थे।

गौरी जानता था कि हिन्दू सैनिको का नियम है कि वे सूर्य उदय से सूर्य अस्त के बीच में ही युद्ध करते है।  गौरी ने अपनी सेना को 5 भागो में बॉटा और सुबह के समय चौहान पर आक्रमण किया जब उनकी सेना युद्ध के लिए तैयार नई थी। राजपूत सेना परास्त हुई और चौहान को गौरी  लिया।

निजी ज़िन्दगी और विरासत – पृथ्वीराज को कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी संयुक्ता से प्रेम हो गया था। लेकिन संयुक्ता  के पिता राजा जयचंद इस विहाह के लिये राज़ी न हुए।  इसलिए उन्होंने अपनी बेटी के विवाह  एक स्वयंवर आयोजित किया, इस स्वयंवर में पृथ्वीराज को छोड़कर  उसने सभी योग्य राजाओ को निमंत्रण दिया। बाद में संयुक्ता  का विवाह पृथ्वीराज से ही हुआ।

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पृथ्वीराज चौहान के बंदी बनने के बाद संयुक्ता और अन्य राजपूत रानियों ने आत्मदाह कर लिया।  इसके बाद चंद्र बरदाई की मदद से पृथ्वीराज ने गौरी की हत्या कर दी।  1992  में पृथ्वीराज का भी निधन हो गया।

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