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“सुभद्रा कुमारी चौहान की 5 कविताये हिंदी में” (Top 5 poems of Subhadra Kumari Chauhan in Hindi)

“सुभद्रा कुमारी चौहान की 5 कविताये हिंदी में” (Top 5 poems of Subhadra Kumari Chauhan in Hindi)
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सुभद्रा कुमारी चौहान हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि झाँसी की रानी कविता के कारण है। वह राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं. सुभद्रा कुमारी चौहान ने 15 वर्ष की आयु से ही लिखना शुरू कर दिया था। जिस समय इन्‍होंने लिखना शुरू किया राजनैतिक दृष्टि से उथल पुथल का युग था। सुभद्रा जी की काव्य साधना के पीछे उत्कट देश प्रेम, अपूर्व साहस तथा आत्मोत्सर्ग की प्रबल कामना है। इनकी कविता में सच्ची वीरांगना का ओज और शौर्य प्रकट हुआ है। हिंदी काव्य जगत में ये अकेली ऐसी कवयित्री हैं जिन्होंने अपने कंठ की पुकार से लाखों भारतीय युवक-युवतियों को युग-युग की अकर्मण्य उपासी को त्याग, स्वतंत्रता संग्राम में अपने को समर्पित कर देने के लिए प्रेरित किया। मैने इस पोस्ट में उनकी 5 कविताये आपके साथ साझा की है. आशा है आपको यह जरुर पसंद आएगी.

सुभद्रा कुमारी चौहान की 5 कविताये हिंदी में-

1.झांसी की रानी – सुभद्राकुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

 

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

 

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

 

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।

 

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

 

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

 

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

 

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

 

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

 

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

 

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

 

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

 

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

 

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

 

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

 

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

 

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

 

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

 

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

2.कोयल – सुभद्राकुमारी चौहान

देखो कोयल काली है पर

मीठी है इसकी बोली

इसने ही तो कूक कूक कर

आमों में मिश्री घोली

 

कोयल कोयल सच बतलाना

क्या संदेसा लायी हो

बहुत दिनों के बाद आज फिर

इस डाली पर आई हो

 

क्या गाती हो किसे बुलाती

बतला दो कोयल रानी

प्यासी धरती देख मांगती

हो क्या मेघों से पानी?

 

कोयल यह मिठास क्या तुमने

अपनी माँ से पायी है?

माँ ने ही क्या तुमको मीठी

बोली यह सिखलायी है?

 

डाल डाल पर उड़ना गाना

जिसने तुम्हें सिखाया है

सबसे मीठे मीठे बोलो

यह भी तुम्हें बताया है

 

बहुत भली हो तुमने माँ की

बात सदा ही है मानी

इसीलिये तो तुम कहलाती

हो सब चिड़ियों की रानी

3.जीवन-फूल – सुभद्राकुमारी चौहान

मेरे भोले मूर्ख हृदय ने

कभी न इस पर किया विचार।

विधि ने लिखी भाल पर मेरे

सुख की घड़ियाँ दो ही चार॥

 

छलती रही सदा ही

मृगतृष्णा सी आशा मतवाली।

सदा लुभाया जीवन साकी ने

दिखला रीती प्याली॥

 

मेरी कलित कामनाओं की

ललित लालसाओं की धूल।

आँखों के आगे उड़-उड़ करती है

व्यथित हृदय में शूल॥

 

उन चरणों की भक्ति-भावना

मेरे लिए हुई अपराध।

कभी न पूरी हुई अभागे

जीवन की भोली सी साध॥

 

मेरी एक-एक अभिलाषा

का कैसा ह्रास हुआ।

मेरे प्रखर पवित्र प्रेम का

किस प्रकार उपहास हुआ॥

 

मुझे न दुख है

जो कुछ होता हो उसको हो जाने दो।

निठुर निराशा के झोंकों को

मनमानी कर जाने दो॥

 

हे विधि इतनी दया दिखाना

मेरी इच्छा के अनुकूल।

उनके ही चरणों पर

बिखरा देना मेरा जीवन-फूल॥

4.प्रभु तुम मेरे मन की जानो – सुभद्राकुमारी चौहान

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।

किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।

यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥

 

इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।

तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥

तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।

जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो॥

 

मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।

और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ॥

मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।

मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है॥

 

तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?

हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?

मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।

बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती॥

 

कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।

दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है॥

मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।

यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला॥

 

यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।

यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी॥

ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।

किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

 

मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।

जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है॥

वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।

और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ॥

 

तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।

छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है॥

मेरी कविता – सुभद्राकुमारी चौहान

मुझे कहा कविता लिखने को, लिखने मैं बैठी तत्काल।

पहिले लिखा- ‘‘जालियाँवाला’’, कहा कि ‘‘बस, हो गये निहाल॥’’

तुम्हें और कुछ नहीं सूझता, ले-देकर वह खूनी बाग़।

रोने से अब क्या होता है, धुल न सकेगा उसका दाग़॥

भूल उसे, चल हँसो, मस्त हो- मैंने कहा- ‘‘धरो कुछ धीर।’’

तुमको हँसते देख कहीं, फिर फ़ायर करे न डायर वीर॥’’

कहा- ‘‘न मैं कुछ लिखने दूँगा, मुझे चाहिये प्रेम-कथा।’’

मैंने कहा- ‘‘नवेली है वह रम्य वदन है चन्द्र यथा॥’’

अहा! मग्न हो उछल पड़े वे। मैंने कहा-

 

बड़ी-बड़ी-सी भोली आँखंे केश-पाश ज्यों काले साँप॥

भोली-भाली आँखें देखो, उसे नहीं तुम रुलवाना।

उसके मुँह से प्रेमभरी कुछ मीठी बतियाँ कहलाना॥

हाँ, वह रोती नहीं कभी भी, और नहीं कुछ कहती है।

शून्य दृष्टि से देखा करती, खिन्नमन्ना-सी रहती है॥

करके याद पुराने सुख को, कभी क्रोध में भरती है॥

भय से कभी काँप जाती है, कभी क्रोध में भरती है॥

कभी किसी की ओर देखती नहीं दिखाई देती है।

हँसती नहीं किन्तु चुपके से, कभी-कभी रो लेती है॥

ताज़े हलदी के रँग से, कुछ पीली उसकी सारी है।

लाल-लाल से धब्बे हैं कुछ, अथवा लाल किनारी है॥

उसका छोर लाल, सम्भव है, हो वह ख़ूनी रँग से लाल।

है सिंदूर-बिन्दु से सजति, जब भी कुछ-कुछ उसका भाल॥

अबला है, उसके पैरों में बनी महावर की लाली।

हाथों में मेंहदी की लाली, वह दुखिया भोली-भाली॥

उसी बाग़ की ओर शाम को, जाती हुई दिखाती है।

प्रातःकाल सूर्योदय से, पहले ही फिर आती है॥

लोग उसे पागल कहते हैं, देखो तुम न भूल जाना।

तुम भी उसे न पागल कहना, मुझे क्लेश मत पहुँचाना॥

उसे लौटती समय देखना, रम्य वदन पीला-पीला।

साड़ी का वह लाल छोर भी, रहता है बिल्कुल गीला॥

डायन भी कहते हैं उसका कोई कोई हत्यारे।

उसे देखना, किन्तु न ऐसी ग़लती तुम करना प्यारे॥

बाँई ओर हृदय में उसके कुछ-कुछ धड़कन दिखलाती।

वह भी प्रतिदिन क्रम-क्रम से कुछ धीमी होती जाती॥

किसी रोज़, सम्भव है, उसकी धड़कन बिल्कुल मिट जावे॥

उसकी भोली-भाली आँखें हाय! सदा को मुँद जावे॥

उसकी ऐसी दशा देखना आँसू चार बहा देना।

उसके दुख में दुखिया बनकर तुम भी दुःख मना लेना॥

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