Biography

ई. श्रीधरन की जीवनी” (Biography of E Sreedhraran in Hindi)

ई. श्रीधरन एक प्रख्यात भारतीय सिविल इंजीनियर हैं।  पुरे देश में उन्हें ‘मेट्रो मैन’ के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय रेल में उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है. कोंकण रेलवे’ और ‘दिल्ली मेट्रो’ का निर्माण उन्ही के नेत्तृव में हुआ है और साथ ही अन्य मेट्रो रेल परियोजनाओं में भी उनका योगदान रहा है। उन्होंने ‘पम्बन पुल’ का 46 दिनों के भीतर पुननिर्माण करके सबको आश्चर्यचकित कर दिया था इस काम के लिए उन्हें ‘रेलवे मंत्री पुरस्कार’ दिया गया। भारतीय रेल में उनके योगदान के लिए,  भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’और ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।

व्यक्तिगत जीवन;-

ई. श्रीधरन का जन्म 12 जून 1932 को पलक्कड़ पत्ताम्बी , केरल में हुआ था। उनके पिता का नाम  के. नीलाकंथल था और उनकी माता का नाम अम्मालू अम्मा था। उन्होंने अपनी शुरूआती पढाई इवैंजेलिकल मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल से पूर्ण की। उसके बाद, उन्होंने गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, काकीनाडा, आन्ध्र प्रदेश  से सिविल इंजीनियरिंग स्नातक किया।

अगर बात करे उनकी लव लाइफ की तो उन्होंने राधा श्रीधरन से शादी की थी. उनके 3 बेटे रमेश, वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में काम करता है, अच्युत , वह यूनाइटेड किंगडम में डॉक्टर है और छोटा बेटा एम. कृष्णदास COWI में काम करता है। और उनकी एक बेटी है जिसका नाम शान्ति मेनन है, वह बैंगलोर में स्कूल चलाती है.

करियर:-

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक’ में सिविल इंजीनियरिंग के प्राध्यापक के रूप में की थी। उसके बाद, उन्होंने एक साल तक बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट में बतौर प्रसिक्षु कार्य किया। 1953 में, वह भारतीय लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित ‘इंडियन इंजीनियरिंग सर्विसेज एग्जाम’ में पास हुए.   1954 में, उन्हें दक्षिण रेलवे में ‘प्रोबेशनरी असिस्टेंट इंजिनियर’ के रूप में नियुक्त किया गया। 1964 में, तमिलनाडू और रामेश्वरम को जोड़ने वाला ‘पम्बन पुल’ एक तूफान के कारण टूट गया था। उस वक़्त के पुनःनिर्माण की जिम्मेदारी श्रीधरन को दी गयी। रेलवे ने पूल की  मरम्मत के लिए उन्हें 6 महीने का समय दिया पर श्रीधरन के बॉस ने सिर्फ तीन महीने में इस कार्य को पूरा करने को कहा और और कमल तो तब हो गया जब श्रीधरन  ने यह कार्य मात्र 46 दिनों में करके सबको आश्चर्यचकित कर दिया। श्रीधरन के इस योगदान के लिए उन्हें ‘रेलवे मंत्री पुरस्कार’ दिया गया।

1970 में, उन्हें भारत के पहले मेट्रो रेल ‘कोलकाता मेट्रो’ की योजना, डिजाईन और कार्यान्वन का कार्य दिया गया। उन्होंने इस अग्रगामी परियोजना को पूरा किया और भारत में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग की आधारशिला भी रखी। सन 1975 में उन्हें कोलकाता मेट्रो रेल परियोजना से हटा लिया गया।1979 में, वह  कोचीन शिपयार्ड में शामिल हुए.  शिपयार्ड का पहला जहाज़ ‘एम.वी. रानी पद्मिनी’ अपने लक्ष्य से बहुत अधिक विलंबित था पर उन्होंने अपने अनुभव, कार्यकुशलता और अनुशासन से शिपयार्ड का कायाकल्प कर दिया और यह सुनिश्चित किया कि उनके नेतृत्व में ही यहाँ का पहला जहाज़ बनकर निकले। सन 1981 में उनके नेतृत्व में ही कोचीन शिपयार्ड का पहला जहाज़ ‘एम.वी. रानी पद्मिनी’ बनकर बाहर निकला। 1987 में, उन्हें पश्चिमी रेलवे में जनरल मैंनेजर के रूप में नियुक्त किया।  जुलाई 1989 में, उन्हें रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाया गया। 1990 में, उन्हें कॉन्ट्रैक्ट पर लेकर कोंकण रेलवे का चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया।  कोंकण रेलवे परियोजना  देश की पहली बड़ी परियोजना थी जिसे BOT (ब्युल्ट-ऑपरेट-ट्रान्सफर) पद्धति पर कार्यान्वित किया गया था।  कई लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात थी कि एक सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजना बिना बिलंभ और बजट बढ़ाये लगभग अपने नियत समय पर पूरी हो गयी थी।

दिल्ली मेट्रो से सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्हें कोच्ची मेट्रो रेल प्रोजेक्ट का मुख्य सलाहकार नियुक्त किया गया। सन 2013 में उन्होंने कहा कि कोच्ची मेट्रो अपने निर्धारित समय लगभग तीन साल में पूरी हो जाएगी। उसके बाद, उन्हें लखनऊ मेट्रो रेल का भी मुख्य सलाहकार नियुक्त किया गया है। उन्होंने जयपुर मेट्रो और अन्य मेट्रो परियोजनाओ में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सम्मान और पुरस्कार:-

भारतीय रेलवे में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें कई पुरुस्कार प्राप्त हुए जैसे पद्म श्री, ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ द्वारा ‘मैन ऑफ़ द इयर, फॉर प्रोफेशनल एक्सीलेंस इन इंजीनियरिंग, सी.आई.आई. ज्युरर्स अवार्ड फॉर लीडरशिप इन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, भारत शिरोमणि अवार्ड, आई.आई.टी दिल्ली द्वारा ‘डॉक्टर ऑफ़ साइंस’, पद्म विभूषण, टी.के.एम. 60 प्लस अवार्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट और अन्य।

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