मीरा बाई भक्ति आंदोलन की एक हिंदू रहस्यवादी कवियत्री थीं। उनका असली नाम योगिनी मीरा था लेकिन लोग उन्हें मीरा बाई के नाम से जानते थे. वह अटल कृष्ण भक्त थीं। यहा तक की उन्होंने श्री  कृष्ण को अपने  पति के रूप में देखा। उस दौर में वह भक्ति आन्दोलन के सबसे लोकप्रिय भक्ति-संतों में एक थीं। मीरा बाई शाही परिवार से संबंधित थी और एक राजकुमारी थी, इसलिए उनके परिवारवालो ने सार्वजनिक गायन और नृत्य को अस्वीकार कर दिया था। मीरा बाई को ईश्वर से बहुत प्रेम था और उन्होंने अपने परिवार और महलो के सुख को भक्ति के लिए त्याग दिया, यहाँ तक कि उन्होंने भक्ति योग के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया।

मीरा बाई के जीवन के बारे में तमाम पौराणिक कथाएँ और किवदंतियां प्रचलित हैं। ये सभी किवदंतियां मीराबाई के बहादुरी की कहानियां कहती हैं और उनके कृष्ण प्रेम और भक्ति को दर्शाती है। उनकी कविताएँ आमतौर पर भजन के रूप में जानी जाती हैं, और पूरे भारत में लोकप्रिय हैं। चित्तौड़गढ़ किले में, मीरा बाई की स्मृति हैं। मीरा बाई का जीवन आधुनिक समय में फिल्मों, कॉमिक स्ट्रिप्स और अन्य लोकप्रिय विषयों का विषय रहा है।

व्यक्तिगत जीवन:-

मीरा बाई के जीवन के बारे में प्रामाणिक अभिलेख उपलब्ध नहीं है। लेकिन विद्वानों ने मीरा की जीवनी को द्वितीयक साहित्य से स्थापित किया है। इन अभिलेखो के अनुसार मीरा बाई का जन्म 1498 मे राजस्थान के मेड़ता के एक राजपरिवार में हुआ था। मीरा बाई के पिता का नाम रतन सिंह राठोड़ था, वह एक छोटे से राजपूत रियासत के शासक थे। जब मीरा छोटी थीं तभी उनकी माता का निधन हो गया था। बचपन से, उन्हें संगीत, धर्म, प्राशासन और राजनीति जैसे विषयों की शिक्षा दी गयी।

“कालिदास की जीवनी” (Biography of Kalidas in Hindi)

1516 में, मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ संपन्न हुआ।1518 में, उनके पति दिल्ली सल्तनत के चल रहे हिंदू-मुस्लिम युद्धों में घायल हो गए थे, और 1521 में युद्ध के घाव से उनकी मृत्यु हो गई थी। कुछ वर्षो बाद, उनके पिता व ससुर भी मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के साथ युद्ध में मारे गये. अपने ससुर की मृत्यु के बाद, विक्रम सिंह मेवाड़ के शासक बने। एक प्रचलित किंवदंती के अनुसार, मीरा बाई को उनके ससुराल वालो ने बहुत प्रताड़ित किया जैसे फांसी देने की कई बार कोशिश की, मीरा को एक गिलास जहर भेजना और उसे यह बताना कि यह अमृत है या उसे फूलों की जगह सांप के साथ टोकरी भेजना है। संचरित्र लेखन के अनुसार, मीरा को कभी भी इन सारी चीजो से कोई हानि नही हुई। उसके बाद, वह  धीरे-धीरे संसार से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं।

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कृष्ण भक्ति:-

अपने पति के निधन के बाद, मीरा बाई अपना सारा समय भक्ति में व्यतीत करने लगी. वह अक्सर कृष्ण मदिर में जाकर कृष्णभक्तो के साथ भजन गाती और मूर्ति के सामने भक्ति में लीन होकर नाचती थी. कुछ समय बाद, मीरा बाई ब्रज की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ीं। सन्‌ 1539 में मीरा बाई वृंदावन में रूप गोस्वामी से मिलीं। वृंदावन में कुछ साल निवास करने के बाद मीराबाई सन्‌ 1546 के आस-पास द्वारका चली गईं।

कवि‍ताएँ:-

मीरा बाई की कई रचनाएँ आज भी भारत में गाई जाती हैं. उनकी अधिकतर रचनाये भक्ति गीतों (भजन) के रूप में है। उनकी सबसे लोकप्रिय रचनाओं में से एक “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” है। 19 वीं शताब्दी की पांडुलिपियों में उनकी कविताओं का सबसे बड़ा संग्रह है। मीरा की शैली में मनोदशा, अवहेलना, लालसा, प्रत्याशा, आनंद और मिलन की उमंग, और हमेशा कृष्ण पर केंद्रित है। विद्वानों ने स्वीकार किया कि धार्मिक संघर्षों से भरे भारतीय इतिहास में एक कठिन दौर के दौरान मीरा भक्ति आंदोलन के केंद्रीय कवि-संतों में से एक थीं। मीरा बाई के जीवन की व्याख्या मीरा-द लवर्स में एक संगीतमय कहानी के रूप में की गई है.

निधन:-

अपने अंतिम वर्षों में, मीरा द्वारका या वृंदावन में रहीं, किंवदंतियों के अनुसार वे 1547 में कृष्ण की मूर्ति में विलीन होकर चमत्कारिक रूप से गायब हो गईं।

मीराबाई अपनी कृष्ण भक्ति, रचनाओं और भजन के लिए काफी लोकप्रिय हुईं। वहीं उनका श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम को आज भी याद किया जाता है।  इसके अलावा उनके गीत या भजन आज भी लोग गाते हैं। मीरा के कई पद हिन्दी फ़िल्मी गीतों का हिस्सा भी बने।

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