हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिन्दी साहित्य का विद्धान माने थे। सूरदास के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह से मनुष्य को सद्गति मिल सकती है। उन्होंने  वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूर ने अपनी कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है। बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टा के चित्रण में कवि ने कमाल की होशियारी एवं सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय दिया है़. जो एक बार भी सूरदास जी की रचनाओं को पढ़ता है वो कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण के रुप का वर्णन श्रृंगार और शांत रस में किया है। हम आपके लिए लेकर आये है “सूरदास के दोहे हिंदी में” (Couplets of Surdas in Hindi). आइये ! हम भी उनके कुछ प्रसिद्ध दोहे को पढ़ते है.

“सूरदास के दोहे हिंदी में” (Couplets of Surdas in Hindi)

दोहा:-1.

“बुझत स्याम कौन तू गोरी। कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी। काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी। सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी।।

तुम्हरो कहा चोरी हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी। सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भूरइ राधिका भोरी।।”

 

अर्थ:- सूरसागर से उध्दुत यह पद राग तोड़ी में बध्द है। राधा के प्रथम मिलन का इस पद में वर्णन किया है सूरदास जी ने। श्रीकृष्ण ने पूछा की हे गोरी! तुम कौन हो ? कहां रहती हो? किसकी पुत्री हो? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हें नहीं देखा। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहतीं। इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी की नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता हैं। तब कृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं की इस प्रकार रसिक कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया।

https://desibabu.in/wp-admin/options-general.php?page=ad-inserter.php#tab-2

सांराश:- कवि ने इसमें नंद किशोर श्री कृष्ण और राधा मिलन का बहुत सुंदर तरीके से वर्णन किया है अर्थात जिस तरह श्री कृष्ण ने अपने तेज और आर्कषण से अतिसुंदर राधा का मन मोह लिया था वैसे ही हमें भी पहली ही मीटिंग में किसी दूसरे पर अपनी बातों से गहरा प्रभाव छोड़ना चाहिए।

दोहा:-2.

“अरु हलधर सों भैया कहन लागे मोहन मैया मैया। नंद महर सों बाबा अरु हलधर सों भैया।।

ऊंचा चढी चढी कहती जशोदा लै लै नाम कन्हैया। दुरी खेलन जनि जाहू लाला रे! मारैगी काहू की गैया।।

गोपी ग्वाल करत कौतुहल घर घर बजति बधैया। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया।।

 

अर्थ:- सूरदास जी का यह पद राग देव गंधार में आबध्द हैं। भगवान् बालकृष्ण अब मैया, बाबा और भैया कहने लगे हैं। सूरदास कहते हैं कि अब श्रीकृष्ण मुख से यशोदा को मैया नंदबाबा को बाबा और बलराम को भैया कहकर पुकारने लगे हैं इतना ही नहीं अब वह नटखट भी हो गए हैं, तभी तो यशोदा ऊंची होकर अर्थात कन्हैया जब दूर चले जाते हैं तब उचक-उचककर कन्हैया के नाम लेकर पुकारती हैं और कहती हैं की लल्ला गाय तुझे मारेंगी। सूरदास कहते हैं की गोपियों व ग्वालों को श्रीकृष्ण की लीलाएं देखकर अचरज होता हैं। श्रीकृष्ण अभी छोटे ही हैं और लीलाएं भी अनोखी हैं। इन लीलाओं को देखकर ही सब लोग बधाइयाँ दे रहे हैं। सूरदासजी कहते हैं की हे प्रभु! आपके इस रूप के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ।

सारांश:- महाकवि सूरदास द्धारा श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन ह्रदय स्पर्शी है, इनके इस दोहे को पढ़कर ज्यादातर लोगों का मन प्रफुलल्लित हो उठता है और वो श्री कृष्ण के प्रति भावविभोर हो जाता है और उनकी भक्ति में डूब जाना चाहता है।

 

“तुलसीदास जी के 10 सर्वश्रेष्ठ दोहे अर्थ सहित हिंदी में” (Tulsidas ji ke 10 Best Dohe Hindi Me)

दोहा:-3.

“जसोदा हरि पालनै झुलावै। हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई सोई कछु गावै।।

मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै। तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै।।

कबहुं पलक हरि मुंदी लेत हैं कबहुं अधर फरकावै। सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै। इहि अंतर अकुलाइ उठे हरी जसुमति मधुरै गावै। जो सुख सुर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनी पावै।।”

 

अर्थ:- राग घनाक्षरी में बध्द इस पद में सूरदास जी ने भगवान् बालकृष्ण की  शयनावस्था का सुंदर चित्रण किया हैं। वह कहते हैं की मैया यशोदा श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही है। कभी तो वह पालने को हल्कासा हिला देती हैं, कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी चूमने लगती हैं। ऐसा करते हुए वह जो मन में आता हैं वही गुनगुनाने भी लगती हैं। लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती हैं। इसलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं की आरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहीं? तू शीघ्रता से क्यों नहीं आती? देख, तुझे कान्हा बुलाता हैं। जब

यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी पलकें मूंद लेते हैं और कभी होठों को फड़काते हैं। जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा की अब तो कान्हा सो ही गया हैं। तभी कुछ गोपियां वहां आई। गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं। इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुन: कुनमुनाकर जाग गए। तब उन्हें सुलाने के उद्देश से पुन: मधुर मधुर लोरियां गाने लगीं। अंत में सूरदास नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते है की सचमुच ही यशोदा बड़भागिनी हैं क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है।

सारांश:- सूरदास जी ने जिस तरह बाल कृष्ण की श्यानावस्था का वर्णन किया है वह वाकई शानदार है अर्थात सूरदास जी ने अपने इस पद से साबित कर दिया कि श्री कृष्ण की निंद्रावस्था की ऐसी व्याख्या तो श्री कृष्ण का कोई अत्यंत प्रिय भक्त ही कर सकता है।

दोहा:- 4.

“मैं नहीं माखन खायो मैया। मैं नहीं माखन खायो। ख्याल परै ये सखा सबै मिली मेरैं मुख लपटायो।।

देखि तुही छींके पर भजन ऊँचे धरी लटकायो। हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो।।

मुख दधि पोंछी बुध्दि एक किन्हीं दोना पीठी दुरायो। डारी सांटी मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो।।

बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो। सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो।।”

 

अर्थ:- “सूरदास का अत्यंत प्रचलित पद राग रामकली में बध्द हैं। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिध्द है। वैसे तो कान्हा ग्वालिनों के घरो में जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा मैया ने उन्हें देख लिया। सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। यशोदा मैया ने देखा की कान्हा ने माखन खाया हैं तो उन्होंने कान्हा से पूछा की क्यों रे कान्हा! तूने माखन खाया है क्या? तब बालकृष्ण ने अपना पक्ष किस तरह मैया के सामने प्रस्तुत करते हैं, यही इस दोहे की विशेषता हैं। कन्हैया बोले ………मैया! मैंने माखन नहीं खाया हैं। मुझे तो ऐसा लगता हैं की ग्वाल – बालों ने ही बलात मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। फिर बोले की मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा हैं मेरे हाथ भी नहीं पहुच सकते हैं। कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा था उसे छिपा लिया। कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगी और कन्हैया को गले से लगा लिया। सूरदासजी कहते हैं यशोदा मैया को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रम्हा को भी दुर्लभ हैं।

सारांश:- श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहने वाले कवि ने अपनी रचनाओं में भगवान् श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर और भावभिवोर वर्णन कर यह सिध्द किया हैं कि भक्ति का प्रभाव कितना गहरा और महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही सूरदास जी ने समाज के सामने ईश्वर की गाथा का अत्यंत सुंदर बखान किया है। इसके साथ ही ईश्वर के प्रति शालीनता, सरलता और स्वभाविक रचना के कारण हिंदी साहित्य का कोई भी कवि इनके समकक्ष नहीं है। सूरदास जी की रचनाएं कृष्ण भक्ति से ओत-प्रोत हैं। जिसके जरिए वे भक्तों को कृष्ण के जीवन का ज्ञान देते हैं। वहीं इनकी रचनाओं से यह तो साफ है कि यह श्री कृष्ण के एक प्रचंड भक्त थे।

 

दोहा:- 5.

“मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु। नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु।।

मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन। चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु।।

इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनी के ऐनु। सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पब्रूच्छ सुरधेनु।।”

 

अर्थ:- राज सारंग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते हैं कि ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं और अंधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उसी भूमि पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं। सूरदास मन को प्रभोधित करते हुए कहते हैं की अरे मन! तू काहे इधर उधर भटकता है। ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती हैं। यहां न किसी से लेना, न किसी को देना। सब ध्यानमग्न हो रहे हैं। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्ममत्व की प्राप्ति होती हैं। सूरदास कहते हैं की ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती। इस पद में सूरदास ने ब्रज भूमि का महत्व प्रतिपादित किया हैं।

सारांश:- ब्रजनगरी को गोकुलनगरी और श्री कृष्ण की नगरी भी कहा जाता है। इसलिए कृष्ण भक्ति में लीन रहने वाले महाकवि ने ब्रज की नगरी के महत्व को बताया है अर्थात कवि ने इस पद से हमें यह सीख मिलती है कि हमें भी ब्रज की महिमा का महत्व समझना चाहिए और मन की शांति और सुकून के लिए ब्रज में बसना चाहिए और श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए इसी से हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।

मैने आपके साथ “सूरदास के दोहे हिंदी में” (Couplets of Surdas in Hindi) साझा किये है, आपको यह पोस्ट कैसी लगी, हमे कमेंट बॉक्स में जरुर बताये!