Mahatma Gandhi Biography in Hindi
Mahatma Gandhi Biography in Hindi

महात्मा गाँधी का जन्म 2  अक्टूबर, 1869 को भारत के पोरबंदर में हुआ था।  महात्मा गाँधी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मुख्या नेता थे। उनके द्वारा किये गए कई आंदोलनों और अनशनों ने आज़ादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई।  

 

प्रारंभिक जीवनइनका पूरा नाम मोहन दास  करमचंद था , इन्हें प्यार से लोग बापू भी कहते है।  उनके पिता का नाम करमचंद गाँधी था जो की पश्चिमी भारत पोरबंदर के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते थे।  उनकी माता पुतलीबाई एक आध्यात्मिक महिला थी।  गाँधी ऐसे वातावरण में पलेबढे जहा अहिंसा,उपवास,ध्यान और शाकाहार को बहुत प्राथमिकता दी जाती थी।  

 

1885 , में उनके पिता के देहांत के कुछ समय बाद उनके जवान बचे का भी निधन हो गया।  गांधीजी बचपन से ही डॉक्टर बनना कहते थे, परन्तु उनके पिता और उनका  सरकारी मंत्री बनाना चाहता था।  इसीलिए उनके परिवार ने उन्हें न्यायिक व्यवसाय में डाल  दिया।  अपने प्रथम पुत्र के जन्म के तुरंत बाद ही उन्हें लॉ की पढाई के लिए लन्दन भेज दिया गया।  पश्चिमी सभ्यता में गाँधी जी का उनके सिधान्तो के  आसान नहीं था, वे  वहाँ  लन्दन वेजिटेरिअन सोसाइटी  शामिल हुए और शाकाहार को बढ़ावा दिया।  

 

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1891 में भारत लौटने पर, उन्होंने वकालत शुरू की लेकिन वो वकालत नहीं कर पाए।  एक साल तक काम ढूंढते रहने पर उन्हें साउथ अफ्रीका में न्यायिक सेवाओ का अनुबंध प्राप्त हुआ।  

 

राजनीतिक नेतागांधीजी ने अफ्रीका  पहूचते ही वहाँ रह रहे भारतीयों के साथ हो रहे रंग भेदभाव के  खिलाफ आवाज़ उठाई।  डरबन कोर्ट  पहूचने के बाद, गांधीजी के उनकी पगड़ी उतरने को कहा गया लेकिन उन्होंने मन कर दिया और कोर्ट छोड़  चले गए।  

 

 7  जून, 1893  को गाँधी जी के  ट्रैन यात्रा के दौरान भेदभाव हुआ।  तभी उन्होंने निश्चय कर लिया कि वे इस भेदभाव के खिलाफ लड़ेंगे। उन्होंने भारतीयों को लेकर एक कांग्रेस बनाई। इसके पश्चात उन्होंने १८९७ तक यह लड़ाई जारी रखी।  यह आंदोलन गान्धीजी के जीवन का मील का पत्थर बनी, जिससे उन्होंने बहुत कुछ सीखा। 

 

 सत्याग्रह – 1906   गांधीजी ने अपना पहला सविनयअवज्ञा आंदोलन चलाया जिसे सत्यग्रह के नाम से  जाना जाता है। जिसका मुख्य कार्य भारतीय विवाह को  मान्यता दिलाने और भारतीयों को  सम्पूर्ण नागरिक अधिकार दिलाना था।  इसके बाद 1914  गांधीजी भारत लौट आये।  

 

भारतीय आज़ादी की लड़ाईभारत आने पर उन्होंने अहमदाबाद में एक आश्रम बनाया जो की सभी धर्मो के लोगो के लिए खुला था।  सीधासाधा जीवन अपनाते हुए उन्होंने वही पर ही ध्यान, उपवास और प्रार्थना शुरू की।  वही पर उन्हें लोग महात्मा के नाम से पुकारने लगे।  

 

1919 में, गांधीजी में राजनीतिक जागृति आई और उन्होंने रौलेट एक्ट का विरोध किया।  इसके लिए उन्होंने सत्याग्रह शुरू किया. लेकिन अमृतसर में अंग्रेज़ो के द्वारा गोली चलने पर हिंसा भड़क गयी और तक़रीबन 400 लोगो की मृत्यु हो गयी।  

 

अब तक गांधीजी देश में भारतीय आंदोलनों का एक चेहेरा बन गए थे। उन्होंने बड़े तोर पे बहिष्कार किया और सभी से ब्रिटिश ताज के लिए काम ना करने का अनुरोध किया।  ब्रोटिश सामान को उपयोग करने की बजाय उन्होंने अपना जरूरत का सामान खुद तैयार करना शुरू किया।  गांधीजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता बन गए थे, उन्होंने आज़ादी पाने के लिए अहिंसा और असमर्थन का नियम बनाया।  

 

दांडी यात्राभारतीय राजनीती में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने 1930 में ब्रिटेन के नमक अधिनियम का विरोध किया।  जिसके अनुसार कोई भी भारतीय तो नमक बेच सकता था और ही खरीद सकता था।  नमक पर भरी कर लगाया गया और लोगो का खाना भी बेस्वाद हो गया।  तब गांधीजी ने नया सत्याग्रह स्टार्ट लिया जिसे दाड़ी यात्रा का नाम दिया गया। कई लोगो के साथ दांडी  पहूँचकर गांधीजी ने खुद नमक बनाया और नियम की खंडित किया।  इस यात्रा में  गांधीजी साथ  करीबन 60,000 लोगो जेल हुई।  इस सत्यग्रह के बाद टाइम मॅगज़ीन ने उन्हें मन ऑफ़ इयर 1930 का नाम दिया।  

 

आज़ादी की लड़ाई – 1931  में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने लॉर्ड इरविन से समझौता किया जिसमे समुद्र के किनारे रहने वाले लोगो को नमक बनाने की छूट मिली।  इसके बाद अगस्त 1931 में गाँधी जी भारतीय संविधान को सुधरने के लिए इंग्लैंड गए लेकिन वो बैठक बेनतीजा रही।  

1934  में गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोड़ दी और पार्टी अपने शिष्य जवाहर लाल नेहरू को सौप दी।  

 

1942 में जब ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध में फस  गया था तभी गांधीजी में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया।  इसके बाद मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सहमति  नहीं बनने पर धर्म के आधार पर देश को बॉट दिया गया। 

 

हत्या– 30  जनवरी 1948  को गाँधी जी नई दिल्ली के बिरला हाउस के प्रार्थना सभा में थे, तो एक हिन्दूवादी  नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मर दी। जिसके लिए 1948 में उसे फाँसी की सजा दी गयी।  उस उग्र इंसान के इस कृत्य ने एक अहिंसावादी की जान ले ली।  

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