Dilip Shanghvi Biography in Hindi

Dilip Shanghvi Biography in Hindi | 10000 Rs से 110000 करोड़ की कंपनी बना डाली

Dilip Shanghvi Biography in Hindi
Dilip Shanghvi Biography in Hindi

उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है पंखों से कुछ नहीं होता है दोस्त होसलो से उड़ान होती है. हमारी इस कथा के नायक हैं श्री दिलीप सांघवी. एक ऐसे शख्स जिन्होंने उधार के मात्र ₹10000 से अपनी बिजनेस की शुरुआत की और अपने बुलंद होसलों और बड़ी सोच से खड़ी कर दी इंडिया की नंबर वन और विश्व की पांचवीं नंबर की जेनरिक दवाई बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी सन फार्मा.

उन्होंने अपने जीवन में एक मंत्र का हमेशा पालन किया कि कभी भी आग लगने पर कुआं खोदने की शुरुआत नहीं करनी चाहिए. भविष्य अनिश्चित है इसलिए तूफान कभी भी आ सकता है और उससे निपटने के लिए इन्सान को हमेशा तैयार रहना चाहिए. 2015 में एक समय ऐसा भी आया था जब उन्होंने भारत के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी को अमीरी में पीछे छोड़ दिया था और भारत के सबसे अमीर आदमी बन गए थे. आज भी वह भारत के सबसे ज्यादा अमीर लोगों में दूसरे नंबर पर आते हैं. कैसे मिली उनको इतनी बड़ी कामयाबी आइये जानते हैं.

1 अक्टूबर 1955 को गुजरात के छोटे से जिले अमरेली में एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में जन्मे दिलीप सांघवी के पिता कोल्कता में जेनेरिक दवाओ के होलसेल डिस्ट्रीब्यूटर थे. पढने लिखने में शुरू से ही होशियार दिलीप जी की हाई स्कूल तक की शिक्षा जे जे अजमेरा हाई स्कूल से हुई. और फिर कोलकाता में स्थित भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज से उन्होंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की. ग्रेजुएशन के टाइम से ही वे अपने पिता के काम में उनकी मदद किया करते थे. ग्रेजुएशन के बाद वे कुछ समय तक अपने पिता के साथ काम करते रहे और फिर कुछ बड़ा करने के इरादे से 1982 में उन्होंने अपने पिता से ₹10000 उधार लिए हैं और मुंबई आ गए. यहां पर केवल दो लोगों की मार्केटिंग टीम के साथ उन्होंने 5 मनोचिकित्सा की दवाइयों के साथ सन फार्मा की शुरुआत की.

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पहले साल उनकी कंपनी की सेल लगभग 7000000 रुपय हुई. उसके बाद उन्होंने कुछ और पैसे उधार लिए और गुजरात के वापी में सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज के नाम से पांच इंप्लॉइज के साथ अपनी पहली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई. उनकी सप्लाई शुरुआत में कुछ शहरों तक सीमित थी लेकिन दिलीप सांघवी और उनकी टीम ने दिन रात कड़ी मेहनत की और महत्व 4 साल के भीतर उनके उत्पाद पूरे देश भर में बिकने लगे. यह वह दौर था जब इंडियन फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में ज्यादातर पेटेंट और अधिक मार्जन वाली मेडिसिंस पर मल्टीनेशनल या फिर से cipla और रैनबैक्सी जैसी कंपनियों का एकाधिकार था. उस समय दिलीप सांघवी कम प्रतिस्पर्धा और बिना पेटेंट वाली जेनेरिक दवाओं में अपना पोर्टफोलियो धीरे धीरे बढ़ाते जा रहे थे. ये ऐसे प्रोडक्ट थे जो उनके प्रतिद्वंदियों की प्राथमिकता में नहीं आते थे. उन्होंने ब्रांड, प्राइसिंग स्ट्रेटेजी, और सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर ज्यादा ध्यान दिया जिसकी वजह से उनकी कंपनी कुछ ही सालों में कई गुना बड़ी हो गयी.

1989 में दिलीप सांघवी ने पडोसी देशो में दवाओ का निर्यात करना शुरू कर दिया जो उनकी तरक्की में एक मिल का पत्थर साबित हुआ. 1991 में उन्होंने आपकी कंपनी के लिए एक रिसर्च सेंटर की स्थापना की और 1994 में उन्होंने अपनी कंपनी का पब्लिक इशू निकाला.

अपने शुरुआती दिनों के वे समझ गए थे की बिज़नस के जुआ हैं और उसमें रिस्क भी है लेकिन उनका मानना था कि रिस्क इतना calculated होना चाहिए कि उसे कंपनी को कोई नुकसान ना हो. दिलीप सांघवी की सफलता में घाटे में चलती हुई कंपनियों के अधिग्रहण का एक बहुत बड़ा रोल रहा है.

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1996 से लेकर आज तक उन्होंने देशी और विदेशी मिलाकर लगभग 19 से ज्यादा कंपनियों का अधिग्रहण किया. जिनमें से अधिकतर कंपनियां घाटे में चल रही थी. उन्होंने उन कंपनियों का नवीनीकरण कर घाटे को प्रॉफिट में बदला और आज उनकी आय का एक बहुत ही बड़ा हिस्सा उन्हीं कंपनियों से आता है. यह दिलीप सांघवी की लीडरशिप का ही कमाल है कि लगभग 33,34 साल पहले शुरु की हुई सन फार्मा आज देश की सबसे बड़ी फार्मा कंपनी बन गई है. पिछले कुछ सालों में उन्होंने कुछ ऐसी कंपनियों का अधिग्रहण किया जिनके अधिग्रहण ने उन्हें फार्मा सेक्टर के शीर्ष पर पहुंचा दिया जिसमें मुख्य तौर पर कार्य को टैरो फार्मा और 2014 में 25237 करोड़ में रैनबैक्सी के अधिग्रहण ने उन्हें इंडिया के फार्म ट्रैक्टर का किंग बना दिया.

आज उनका सेल्स नेटवर्क लगभग 24 से ज्यादा देशों में फैला हुआ है. उनकी कंपनी आज जेनेरिक दवाएं बनाने वाली भारत की नंबर वन और विश्व के पांचवें नंबर की कंपनी बन गई है. कंपनी की बढ़त का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि यदि 1994 में किसी व्यक्ति ने उनकी कंपनी में केवल ₹10000 के शेयर खरीदे थे तो आज उनकी कीमत 5000000 Rs है जिसमें डिविडेंड शामिल नहीं है. दूसरे नंबर की कंपनी डॉक्टर रेड्डीज़ वैल्यूएशन के लिहाज से सन फार्मा से लगभग 3 गुना पीछे है.

ये आश्चर्यजनक है की कैसे एक मध्यम वर्गीय परिवार के व्यक्ति ने केवल ₹10000 से 1 लाख करोड़ से भी ऊपर का साम्राज्य बना डाला. जिनके पास है ना तो मुकेश अंबानी की तरह उनके पिता की कोई संपत्ति थी और ना ही खुद के पास कोई खास पूंजी. बस पास में था तो एक लक्ष्य और एक दृढ़ संकल्प.

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अंत में इतना ही की हर सपने को अपनी सांसों में रखो, हर मंजिल को अपनी बाहों में रखो, हर जीत आपकी है दोस्त बस अपने लक्ष्य को अपनी निगाहों में रखो.

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